Tuesday, 22 July 2014
“If a man looks at the sky at night, he finds a few stars and celestial objects; but if he looks through a powerful telescope, he finds many more not visible to the naked eye. Their invisibility does not mean their absence. If we can raise the power of our sensitivity and perception to that extent through excellent practice we would not require any sort of external aid for the purpose. This is a factual reality and has nothing supernatural about it.” - Sree Sree Thakur Anukulchandra Alochana Prasange [Vol-X, 28.01.48]
Monday, 21 July 2014
¤:अनुमति :¤ श्यामाचरण मुखर्जी उर्फ गोपाल -दा और फिलानथ्रापी आफिस के कर्मी दुर्गाचरण सरकार दोनोँ राजबाडी , फरीदपुर जिला जाने के लिए परमदयाल श्री श्री ठाकुर से अनुमति माँगे । श्री श्री ठाकुर जाने के लिए असहमति व्यक्त किए । जाने की अनुमति नहीं दिए । लेकिन गोपाल -दा एवं दुर्गाचरण-दा वहाँ जाने का जिद करने लगे । अंत में श्री श्री ठाकुर उदास मन से धीमे स्वर में बोले -गोपाल ! सोमवार सुबह तक लेकिन राजबाडी से आश्रम वापस लौट आना । जरूर लौट आऊँगा , बोलकर गोपाल-दा और दुर्गाचरण-दा राजबाडी, जाने के लिए निकल पड़े । राजबाड़ी जाने के लिए ईश्वरडिह स्टेशन से ट्रेन पकड़कर पोड़ादाह जं॰ उतरना पड़ता था और फिर दूसरी ट्रेन पकड़कर राजबाडी के लिए राजसाही स्टेशन में उतरना पड़ता था । वहाँ से लौटते समय वे दोनों राजसाही से निर्दिष्ट दिन ट्रेन पकड़ कर पोड़ादह जं॰ तक आए । पोड़ादह जं॰ पहुँचने पर जब गोपाल -दा उतरने लगे तो दुर्गाचरण-दा उनको रोकते हुए बोले मैं तो कलकत्ता तक का टिकट लिया हूँ । गोपाल - दा कलकत्ता जाने से अस्वीकार करते हुए बोले - मैं श्री श्री ठाकुर से आज लौटने का वादा करके आया हूँ । बातों -बातों में ट्रेन खुल गई । गोपाल-दा उतरना चाह कर भी दुर्गाचरण-दा के बातों में उलझ कर उतर नहीं पाए ।आगे जाकर ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई । गोपाल -दा और दुर्गाचरण-दा दोनों इस दुर्घटना में मारे गए । इस दुर्घटना के कुछ दिनों बाद श्री शैलेन्द्रनाथ भट्रटाचार्य हिमायतपुर सत्संग आश्रम में एक दिन श्री श्री ठाकुर से हाथ जोड़कर निवेदन करते हुए पूछे थे -ठाकुर !आप तो सबकुछ जानते हैं -गोपाल -दा ट्रेन दुर्घटना में मारे जाएँगे । आप यदि दया करके पहले ही बता देते तो वे बच सकते थे । श्री श्री ठाकुर बहुत गंभीर होकर बोले थे - केवल डर दिखाकर और भविष्य - वाणी करके यदि तुमलोगों को मेरे पास रखना होता , तब मेरा प्रयोजन तो सिर्फ इतना भर ही काम के लिए होता । "मैं " ही यदि तुमलोगों की चाह रहूँ , तो जो मैं बोलता हूँ उसे मानने में इतना प्रश्न क्यों है ? ---" इष्टमनन " से
Sunday, 20 July 2014
पूजा सन 1949 की बात है । श्री श्री ठाकुर यति -आश्रम मेँ उपविष्ट हैँ । पश्चिम बंगाल के कम्युनिष्ट पार्टी का एक नेता मिलने आए । बातचीत करने के दौरान वे पूछे - ठाकुर, जिनको पुकारने से मिलते नहीं हैं, मनुष्य की विपत्ति में उपस्थित नहीं होते हैं, जो मनुष्य की आशा -भरोसा को पूर्ण नहीं करते हैं वैसे भगवान की मनुष्य पूजा क्यों करता है और ऐसे भगवान की हमलोगों को प्रयोजन ही क्या है ? देखते हैं कितने लोग उनको पुकारते हैं, लेकिन वे तो कभी सामने उपस्थित नहीं होते हैं ? श्री श्री ठाकुर तम्बाकू पीते -पीते बोलेँ - मान लेँ आप रेस्टोरेन्ट में बैठकर कप में चाय पी रहें हैं , चाय का हर घूँट आपको एक नई उत्तेजना का आस्वादन दे रहा हो । लेकिन इसी कप में कुछ समय पहले हो सकता है एक संक्रामक रोगग्रस्त व्यक्ति चाय पीकर गया जिसकी जानकारी आपको नहीं है । अपने आनंद का आस्वादन पाने के चक्कर मेँ प्रतिषेधक की तरफ अपने कोई दृष्टि नहीँ दिया - जिसके चलते हो सकता है वह रोग जीवाणु आपके शरीर के अन्दर प्रवेश करके छुपा रहा और कुछ वर्षो बाद वह आपके शरीर को रोगजीर्ण बना दिया । आप उस समय सोचने लगे मैं तो इस रोग की इच्छा जाहिर नहीं किया था तो भी मुझे यह क्यों हुआ ? रोग से ग्रसित होने के बाद उसका कारण जानना कोई बड़ी बात नहीं है - रोग नहीं होने के लिए जो-जो करना उचित था वह आपने नहीं किया । जीवन को रोग से ग्रसित होने बचाने के लिए जो-जो सावधानी बरतनी चाहिए थी वह आपने नहीँ किया- यदि वह अज्ञानता के चलते हो तब भी प्रकृति के इतिहास में उसके लिए क्षमा नहीं है । गलती से आग में हाथ डालने से आग किसी को क्षमा नहीं करता है चाहे वह कितना ही मासूम क्योँ न हो । इसीलिए जो-जो करने से जिसकी प्राप्ति होती है उसे नहीं करने पर कैसे आपकी इच्छा पूर्ण होगी ? पानी बनने की सामग्री ( Hydrogen और Oxygen) हो सकती है आपके आस -पास ही हो, लेकिन आपके चाहने से ही क्या वह पानी बन जाता है -उसको Laboratory में ले जाकर एक Certain Temperature एवं आवोहवा सृष्टि करने पर Hydrogen और Oxygen आपस में प्रतिक्रिया कर जल बनाता है । इसलिए प्रत्येक क्रिया ही एक विधि या नियम का अवलम्बन करती है । इसलिए भगवान का एक नाम है ' विधाता '। वे विधि को धारण करते हैं एवं स्वयं स्रष्टा होने के बावजूद वे भी इस सृष्टि के नियम के माध्यम से सृष्ट होते हैं । इसलिए जो-जो नीति या विधि के माध्यम से मनुष्य भगवान को प्राप्त कर सकता है उस विधि को छोड़कर उनको पुकारना व्यर्थ है । अतः गीता में है - " अवज्ञानन्ति माँग: मूटा मानुसिँह: तनुमाभितम् ।" "के तुमि विप्लवी?"से
Monday, 17 March 2014
The most important line for life : " For Best Life Follow Living Ideal , you can get everything with Greatness".
http://www.youtube.com/watch?v=kpI5RsGoe68
Wednesday, 5 March 2014
THE SCOTT'S POCKET WATCH These two Scottish characters are chatting. One of them then pulls out an expensive looking pocket watch from his pocket to check the time. "That's a fine watch you got there!" says the other. "Yeah it is, isn't it? I got it from my grandfather," says the guy with the watch. "Really?" "Yeah, he sold it to me on his death bed."
Wednesday, 5 February 2014
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